📒जीवन परिचय:-
राठौड़ राजवंश के पाबूजी राठौड़ का जन्म 13वीं शताब्दी में फलौदी (जोधपुर) के निकट कोलूमण्ड में धाँधल एंव कमलादे के घर हुआ। ये राठौड़ों के मूल पुरुष राव सीहा के वंशज थे । इनका विवाह अमरकोट के राजा सूरजमल सोढा की पुत्री सुप्यारदे से हो रहा था कि ये फेरों के बीच से ही उठकर अपने बहेनोई जीन्दराव खींची से देवल चारणी (जिसकी केसर कालमी घोड़ी ये माँग कर लाए थे) की गायें छुड़ाने चले गये और देचू गाँव में युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए। अतः इन्हे गौ-रक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।
📒प्लेग रक्षक एवं ऊँटों🐫 के देवता:-
प्लेग रक्षक एवं ऊँटों के देवता के रूप में पाबूजी की विशेष मान्यता है। कहा जाता है कि मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊट ( सांडे) लाने का श्रेय पाबूजी को ही है । अत: उँटों की पालक राइका ( रेबारी )जाति इन्हें अपना आराध्य देव मानती है । ये थोरी एवं भील जाति में अति लोकप्रिय हैं तथा मेहर जाति के मुसलमान इन्हें पीर मानकर पूजा करते हैं । इन्हें लक्ष्मण का अवतार भी माना जाता है।
📒 अन्य महत्वपुर्ण बातें:-
➊पाबू जी केसर कालमी' घोड़ी एवं बाँयी और झुकीं पाग के लिए प्रसिद्ध है । इनका बोध चिह्न 'भाला' है।
➋ कोलूमण्ड में इनका सबसे प्रमुख मंदिर है , जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को मेला भरता है।
➌ पाबूजी से संबंधित गाथा गीत ' पाबूजी के पवाड़े' माठ वाद के साथ नायक एवं रेबारी जाति द्वार गाये जाते हैं।
➍ पाबूजी की पड़ ' नायक जातिं के भोपों द्वारा ' रावणहत्था ' वाद्य के साथ बाँची जाती है।
➎ चाँदा-डेमा एवं हरमल पाबूजी के रक्षक सहयोगी के रूप में जाने जाते हैं ।
➏ आशिया मोडुजी द्वारा लिखित ' पाबू प्रकाश ' पाबू जी के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण रचना है।
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राजस्थान के लोक देवता गोगाजी✍✍
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